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Hymn No. 2148 | Date: 28-Jan-2001
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ऐ पिता रखना तू साथ सदा, अनजान डगर पे मेरी न पहचान है किसीसे।
ऐ पिता रखना तू साथ सदा, अनजान डगर पे मेरी न पहचान है किसीसे।
राह की भयावता का ख्याल किये बगैर निकल पड़ा पिता तेरा हाथ पकड़ के।
ठोकरे खाई मिली चोट भी बहुत फिर भी सीखता कुछ भूल कर जाता चूक कही न कही।
हाथों में है तेरे अचूक बनाना, न रखना तू मेरी काबिलियत पे भरोसा।
कितना भी छुड़ाऊँ दौडूं इधर - उधर,पर रखना तू मुझपे पैनी नजर अपनी।
वैसे तो मुझको कबूल न है जाना दूर तुझसे, पर दिग्भ्रमित होके कर न जाऊँ कोई भूल।
चुभ चुके है हृद्य में कई शूल, जिसकी पीड़ा हुयी है कई बार तुझको।
अब न करना चाहता हूँ हैरान तुझको, चाहे गुजरना पड़े कितनी भी विषम परिस्थितियो में।
सहा है न जाने तू कितना दर्द, जो दिया है जाने अनजाने में हमने।
अब करना चाहता हूँ प्यार, हो गम चाहे हजार, पलके बिछाये मुस्कुराके करूं स्वागत तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह