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Hymn No. 2147 | Date: 27-Jan-2001
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दुःख ही दुःख है चारों ओर, गुजरना पड़ता है हर किसीको इस छोर से।
दुःख ही दुःख है चारों ओर, गुजरना पड़ता है हर किसीको इस छोर से।
बचना चाहे बच न सके कोई इससे, आते है सिले सिलेवार जीवन में सुख दुख के पहलू।
ढोना पड़ता है भार इनका, टाले टलते नहीं छोड़ जाते है छाप यादों में।
उबरना होता है मुश्किल, सब्र का हर बांध टूट जाता है दिल में।
इक इक पल होता पहाड़ सा भारी,धसक जाती है जमी पैंरो के नीचे की।
टूट जाता है मन सबसे, अपने बदल जाते है यादों की तसवीर में।
मन में रह जाता है बस डर, कानोंकान खबर हो किसीको उससे पहले घट जाता सब कुछ।
लीला अपरम्पार है तेरी, विवश करते है करम हमारे दुःखों के सैंलाब को।
मरनेवालों को न है कभी फरक पड़ता, जिंदा लोगों को ढोनी पड़ती है यादों की लाश।
ऐ कैसा खेल है माया का, जितना समझना चाहा उतना ही ना कुछ समझ पाय।


- डॉ.संतोष सिंह