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Hymn No. 2150 | Date: 30-Jan-2001
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प्रभु जी प्रभु जी बिरला ही क्षण होता है, जब मन तुझसे न कुछ कहता हो।
प्रभु जी प्रभु जी बिरला ही क्षण होता है, जब मन तुझसे न कुछ कहता हो।
राहत पाता है तेरे पास आके, कितना भी होना रहने पे रहने का अहसास दिल को।
माना होगी कोई कमी मेरे विश्वास में, जो न हुयी है अभी तक पूरी।
पर श्वास दर श्वास में होता है अंतर, तेरे रहने पे तिरता हूँ जैसे आनंद की बदली पे।
मेरी हालत तो है उस पपीहे की तरह, जिसकी प्यास बुझे उस स्वाती नक्षत्र की बरसात में।
शायद तड़प है मेरी बहुत कमजोर, जो अब तक अहसास दिला न सका प्यार का तुझको।
कुछ भी दोष मढ़ दो कर लूंगा, कबूल कहने की बात तो बहुत दूर की।
पर मन मन में कह उठा है, मेरा प्यार तुझको झुकाने के लिये न है वो तो मरता है तुझपे।
तेरी तो तू जाने, पर मेरा दिल कसम से, तेरे सिवाय किसी और को न माने।
बदनाम हूँ सारे जमाने में प्यार को लेके, पर तेरे सिवाय मन अब तक कोई न भाया।
- डॉ.संतोष सिंह
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