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Hymn No. 2194 | Date: 28-Feb-2001
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प्रभु ऐसा क्यूँ है, हम रहना चाहते है मसरूफ प्यार में तेरे।
प्रभु ऐसा क्यूँ है, हम रहना चाहते है मसरूफ प्यार में तेरे।
फिर भी तू रखा है महफूज प्यार से तेरे।
ऐसी कौन सी बात है जो तुझे रास आती नहीं।
करने देता नहीं वास तेरा, श्वासों में हमारे।
न जाने कौन से जन्मों का है पाप, जो डिगा जाये हमको।
करने चलता हूँ कहा तेरा कर जाता हूँ कुछ और।
चखा जबसे जामे प्यार का, हो गया दुष्कर जीना।
करवटों में रातें है गुजरती दिन रहता परेशानी में।
कब तक सहना पड़ेगा तेरे रहते तेरे बिना जिना पड़ेगा।
मत बरपा कहर वियोग का, बस्सा दे कृपा मिलन की।


- डॉ.संतोष सिंह