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Hymn No. 2193 | Date: 28-Feb-2001
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प्यास जागी रे तेरे प्यार की, काटे विरह की बेंला।
प्यास जागी रे तेरे प्यार की, काटे विरह की बेंला।
रातो को जगाये ख्वाब, दिन को ढूँढता फिरता यादों में ।
मोहे रास न आये किसी की सोहबत, जबसे लगी तोहमत।
मोहे न थी खबर तेरे रहते क्या हुआ था मुझसे रहबर।
नितांत अकेला जी रहा हूँ जीवन अपनो परायों के संग।
कहने को तो सब है, सबके रहते लगता नहीं मन।
झूठ है या सच आके जान लें, किसी भी बहाने मिल लूंगा तुझसे।
तड़प मुझसे मेरी सही नही जाये, हर किसी से बातें करूं दिल की।
आहें निकलती है बनके चित्कारी, कैसे बना बैठा है तू इतना निर्मोही।
सोच पड़ा हूँ रात दिन ऐसा क्या कर दूँ जो हलचल मचा दे दिल में मेरे।
- डॉ.संतोष सिंह
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