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Hymn No. 2196 | Date: 28-Feb-2001
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जलवे दिखाये बरपाये कहर तू प्यार में।
जलवे दिखाये बरपाये कहर तू प्यार में।
ऐं। मालिक अनोखी है रीत सताके प्यार करने की।
दम निकलता है जहां में, और तू मुस्कराये देखके हमको।
ऐसा क्या हुआ था, जो तू रोकता है प्यार में।
माना पूर्व के कर्म न है ऐसे जो करे मजबूर तुझे।
मांगता न हूँ कुछ, मांगता हूँ तेरे साथ होने का अहसास।
दिन रात खोये हुये ख्यालों में तुझसे बाते करने का।
न जाने कितने जन्मों की है अभिलाषा तुझे पाने की।
जब पूरी करता है तू सब कुछ, तू क्यूँ रखा है आस अधूरी।
दशा की गुहार सुन ले, मेरी मनोव्यथा की पुकार सुन ले।
- डॉ.संतोष सिंह
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बहोत मुश्किल है उसके लिये कुछ कहना, मानता नही किसीका कहना।
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ओ। पूरन परमात्मा, उतरे हो धरा पे बनके अवतारों के अवतार महाअवतार।
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