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Hymn No. 2259 | Date: 13-Apr-2001
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चली रे चली पवन सरहदो को लाघते, कोई क्या नाम दे कोई मतलब नही, मतलब है तो बहने से रे। ...
चली रे चली पवन सरहदो को लाघते, कोई क्या नाम दे कोई मतलब नही, मतलब है तो बहने से रे। ...
बहे रे बहे जल इस देश से उस देश में, कंदरा वन रेगिस्तानों से, किसने क्या सुलुक किया कोई मतलब नहीं, मतलब है तो प्यास बुझाने से रे...
पाखियो को उड़ते देखा, हर सीमा को लांघते देखा, बसेरा बनाया बेहिचक सारे संसार को,
पर किसी पांखी ने किसी पांखी को कभी ना टोका कि तू यहाँ क्यों आया रे...
प्रभु तेरी दुनिया को बदलते देखा सरहदो में, सरहदो के लिये तेरे पुत्रो को लड़ते देखा
मिटाने के बजाये सरहदो को बनाते देखा ऐ बे मतलब दुनिया को बाटते देखा...
निपढे संत फकीर तोड़ें ऐसे रिवाजों को, नासमझ प्रेमी न माने दुनिया के रिवाजो को
फिर भी न माने इन्सान बेमतलब से भरे दरकारों को...
किस मजहब के कहने से कैद किया तूने खुद को सरहदो में, जब लांघे हर समय
सीमा को खुदा तो क्यों रखा तूने अपने आपको सबसे जुदा...।
- डॉ.संतोष सिंह
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