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Hymn No. 2268 | Date: 19-Apr-2001
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बरसती है तेरी कृपा अनुपम हर पल, धड़क उठता है दिल धुनो पे तेरी।
बरसती है तेरी कृपा अनुपम हर पल, धड़क उठता है दिल धुनो पे तेरी।
नाचता है हर पल मन तेरे संग, खोये हुये ख्वाबों में नये संसार रचते हुये।
मनगढत हो सकती है मेरी बातें, पर प्यार में सच्चा है कल्पनाओं का संसार।
वहाँ ना होता है कभी बिछुड़ने का अहसास, सुख दुःख से परे दिल रमता है आनंद में।
लाजमी है यथार्थ से कोई लेना देना नहीं, फिर भी मस्ती रहती है बिना किसी बात के।
हाँ तरसता हूँ कई बार तेरे वास्ते, जब होती नहीं पुरी तो घिर जाता हूँ तेरे ख्यालों से।
बेंहयाई कहो या कुछ और, पर इस तरसते हुये की प्यास बुझाता है तू अनजाने में।
साथ कोई दे या ना दे, पर तेरी यादों से जुड़ते पहुँच जाता हूँ पास तेरे।
बिगड़ती हुयी हर बात बन जात है, अनजाने में कोई आके मनचाहा काम कर जाता है।
ठुमकता हूँ कभी मनाता हूँ, तुझसे पर भरी बात कह सुनके गुजराता हूँ समय मिलने के।
- डॉ.संतोष सिंह
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कुछ कर दे ऐसा बन जाऊँ बैरी अपने आपका, गाता फिरू गीत संसार में।
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रच बुन रहा हूँ अपने प्यार के संसार को अपने ख्यालों में।
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