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Hymn No. 233 | Date: 26-Jul-1998
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किस पल क्या हो जाये, तैयार होता है, उस होने के लिये,
किस पल क्या हो जाये, तैयार होता है, उस होने के लिये,
अच्छे-बुरे का बोध किये बिन् सबको अपने गले लगाना है ।
देना किसको क्या है, लेना किससे क्या है, ये सब भूल जाना है;
उसके आगे पीछे, उसके रहने या न रहने पे बस उसकी रट लगाना है ।
जाना कहाँ है, कहाँ नहीं, इस मन को क्यों भटकाना है,
अब उस मन को मन में ही लगाना है ।
खोयें बहुत कुछ, पायें बहुत कुछ अब इससे उबर जाना है;
कहाँ कुछ ले जाना है, खाली हाथ आयें थे, खाली हाथ चले जाना है ।
माना तो बहुत कुछ, पर अंदर से नहीं माना है,
जो माना है, अब वही करके दिखाना है ।
मज़ा बहुत लिया, तन को सजाये कई बार - बार;
अब मन को सजाना है, दिल को तुझमें लगाना है ।
ना – ना बहुत कर लिया, अपने आप की अनुकूलताओं के पीछे बहुत दौड़ा,
अनुकूलताओं को छोडके अब मस्त हो जाना है उसके लिए ।


- डॉ.संतोष सिंह