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Hymn No. 234 | Date: 27-Jul-1998
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जो होना था वो तो हो गया, उस बात को लेके क्या रोना,
जो होना था वो तो हो गया, उस बात को लेके क्या रोना,
बीती बातें बिसारकें मन को फेर, इक नई सुबह से शुरूआत कर ।
यें जीवन का सागर, कभी किनारे, कभी मंझधार में रहना होता है
सुख – दुःख के आँधियों के थपेडां को सहके पार होना पड़ता है ।
पूजा से बढ़के यें पूजा है, जीवन के हर पहलू को जीके, पास जाना होता है प्रभू के।
इस यात्रा में चलते है कई लोग उसके यहाँ से, भटक जाते है रास्ते में ।
कई डूब जाते है आंधियों में फँसके, कई खुद ही खुद डूबो देते है अपनी नैंय्या को
शांत रहके विषम परिस्थिती में, प्रभु का बार – बार नाम लेके खैना है इसे ।
ना ही बहुत तेज, ना ही धीरे – धीरे, तूझे तो सम्यक् रूप में एक सा चलना है;
अपनों की परवाह करनी पड़ेगी, खुद का जोर हर जगह नहीं लगाना ।
सबकी मदद लेते हुये धीरे – धीरे अपनी मंजिल की और बहना पड़ेगा;
खाली नैय्या से अच्छा है, सबको चुपचाप लेके चलना पड़ेना है।
अपना भार तो हर जानवर उठाता है, तू तो इंसान है;
प्रभु को याद करते हुये, अपने आप पे, हर हालत पे काबू पाते हुये बढ़ना पड़ेगा ।


- डॉ.संतोष सिंह