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Hymn No. 235 | Date: 27-Jul-1998
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दल –दल में खुद फँसते है, फिर गुहार लगाते है मदद के लिये;
दल –दल में खुद फँसते है, फिर गुहार लगाते है मदद के लिये;
आँख होते हुये ढके रहते है, ठोकर लगने पे रोते है ।
जलते है बिन कोयले के अपने आप में, आग भी शरमा जाये,
मुक्तजीने की आदत डाल रखी है, मीन – मेख सबमें निकालते है ।
जानते हुये भी सब कुछ अपनी रौ में बहते है, आदत को स्वभाव में बदलते है;
कुछ घट जाता है उलटा, तब गिडगिडाते बार – बार कसमें खाते है ।
भरोसा दिलाते है प्रभु को, पर खुद भरोसा रखतें नही, ना ही कुछ समझते है
आदत के चलते बार – बार उलझते है, बनते है, जग हंसाई के तब पात्र ।
तौबा के बाद तौबा, कितनी बार करेंगे अपने आप से तौबा,
सही गलत के फेरे में ना पड, ना ही तू किसी से उलझ ।
अपनी समझ अपने तक रख, जो समझे उसे समझा, खुद नासमझी ना दिखा;
छोड दे प्रभु पे सब कुछ, देख के भी अनदेखा कर दें चुपचाप ।
होनी को तू ना बदल सकता है, जो होने वाला है वो होके रहता है,
शरण ले ले तू परम् की, परम ही सब कुछ बदल सकता है ।


- डॉ.संतोष सिंह