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Hymn No. 2390 | Date: 12-Jul-2001
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कातर स्वरों से गाता हूँ तेरी जिंदादिली के गीत।
कातर स्वरों से गाता हूँ तेरी जिंदादिली के गीत।
गया गुजरा होते हुये फख्र करता हूँ तूझपे मौला।
हर बार टूटने के बाद दिलाता हूँ याद, हूँ तेरी जात का।
लाखों बार हारा हूँ पर रखता हूँ तमन्ना जीतने का तुझे।
अब दिन की तलाश में करता हूँ प्रयास लगातार मैं।
अब न बहेंगे आँसू, जो भांफ बनके उड़ चुके है गमों से।
कहकहा लगाता हूँ कम से कम मसखरा तो हूँ तेरी महफिल का।
कोई मलाल नहीं मन में, होना चाहता हूँ हलाल तेरे प्यार में।
मस्ती में फिरते रहना चाहता हूँ, अपनी बेहाली पे कहाकहा लगाते।
आजमाना न चाहता हूँ किसीको, हकीकतों से रखना चाहता हूँ वास्ता।
- डॉ.संतोष सिंह
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छिपा न है तुझसे कुछ, कहके कहने से बचना नहीं चाहता।
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