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Hymn No. 2391 | Date: 13-Jul-2001
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भरमाना न चाहा कभी किसीको, कसम से भरम में रहा चाहे खुद।
भरमाना न चाहा कभी किसीको, कसम से भरम में रहा चाहे खुद।
लाखों करोड़ों दोष है मुझमें, कसम से पर प्यार सच्चा है तुझसे।
बढ़ाना चाहता हूँ जोर तेरी चाहत का, उबर जाऊँ जो मैं खुद से।
याद आने पे पाता हूँ तनहाँ खुद को, भरता नही मन यादों से तेरी।
अपने हालात का मढता नहीं दोष किसीपे, पर कहना चाहता हूँ हाल अपना।
झुठी हो या सच्ची उठती है कसक दिल में, रह जाता हूँ मन मसोस के।
स्वीकारता हूँ हर बात तेरी, इलजाम नहीं थोपना चाहता किसीके सर पे।
जी नहीं सकता हूँ तेरे बिन, पर मरना भी न आये प्यार में तेरे।
कुछ भी करके करना चाहता हूँ कहा तेरी, चाहत को ढाल दे तू कर्मों में।
रहता हूँ बेख्याली में, समझ नहीं पाता दुनिया की व्यवहारिकता को।
- डॉ.संतोष सिंह
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