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Hymn No. 2402 | Date: 25-Jul-2001
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मालिक जब तेरी रजामदी को मान चुका हूँ, निभाऊँगा कैसे भी चाहे हो जाये कुछ।
मालिक जब तेरी रजामदी को मान चुका हूँ, निभाऊँगा कैसे भी चाहे हो जाये कुछ।
आँसू उपजेंगे तो इस बात से, जब रजामंद था तो तुझसे अलग क्यों सोच जनमी मेरे दिल में।
क्या होगा, क्या न होगा फिकर नहीं, पर तेरे पास रहते मन में बात क्यों खटकी।
तेरे प्यार में न थी कोई कमी, तुझसे जुड़े दिल में कोई ओर बात क्यों उपजी।
सताया हूँ मैं अपने आपका, बदनाम न करना चाहूँ किस्मत ओर कर्मों को।
डरता हूँ बहुत तुझे खोने से, नींद में चिपटता हूँ तेरे सीने से।
अब न चाहता हूँ हो कुछ ऐसा, जो करे मजबूर तुझे दूर होने से।
जानता हूँ तू जानता है सब कुछ, फिर भी कहे बिना नहीं मानता दिल अब।
नैया भँवर में फंसी है, तेरी मर्जी पे हम सबकी मर्जी टिकी है।
किया था तूने सावधान, जो रहता सावधान तो ना आती नौबत ये आज।
राज जो छिपा है वो जानना नहीं चाहता, पर गिरने ना देना मेरे प्यार पे गाज।
गुजर रहा है कैसे भी करके गुजर जायेगी, पर तेरे बिना बेमौत मौत हो जायेगी।
- डॉ.संतोष सिंह
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