VIEW HYMN

Hymn No. 2460 | Date: 30-Sep-2001
Text Size
घायल है मेरा दिल आशिकी के खेल में, यहाँ ना कोई अपना है ना पराया।
घायल है मेरा दिल आशिकी के खेल में, यहाँ ना कोई अपना है ना पराया।
बड़ी देर से जाना दिवानों की महफिल में, कि हम भी तो हैं दीवाने।
ईलाज कौन करे, जब विरह दर्द में मजबूर है हम सब एक से।
कहना किसी से कुछ नामुमकिन है, जब बयाँ करती हों नजरें।
धड़क उठता कहे दिल जब जब आहट होती है दर पे किसी के आने से।
वख्त थम सा गया है, श्वासों के होते हुये जीवन गुम सा गया है।
मन उचटा उचटा सा रहता है, अनायास न जाने कितने ख्याल आते है मन में।
तब याद आते है अपने फूटे करम, कहीं वही तो नही कारण विरह के।
इतना निर्दयी वख्त गुजरा न था कभी जो हर पल लहुलुहान करता है दिल
दिल की बैचेनी न जाने कब उबार आती है पन्नों पे शब्द बनके।


- डॉ.संतोष सिंह