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Hymn No. 250 | Date: 01-Aug-1998
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बना दे मुझे तू पागल तेरे प्यार में दर – दर की ठोकरें खाता फिरूँगा तेरे ख्याल में ।
बना दे मुझे तू पागल तेरे प्यार में दर – दर की ठोकरें खाता फिरूँगा तेरे ख्याल में ।
गम और खुशी क्यों होती है, इससे बेपरवाह मैं तुझसे हँस हँसके बातें करते हुये रोता फिरूँगा ।
सुध ना हो मुझे उस तन की, मैं तेरी बेसुध में खोया रहूँ इतना ।
दर्द क्या, दवा क्या है, बेपरवाह होके उससे मैं तेरा गीत गाता रहूँगा।
शोर वहाँ, शांति कहाँ पागल तो होते है इन सबसे मुक्त, मैं तेरी यादों में कहीं बैठा रहूँगा ।
लुटने का दर्द ना होगा ना ही घमंड देने का, मेरे रोम में रोमांच होगा तू पास है इस अहसास से।
खाने – पीने की चिंता से मुक्त, जूठन मिलें या जानवरों का चारा, हम तो चर जायेगे तेरा प्रसाद समझकें
हर दिन त्योहार होगा, हर पल खुशी में बीते, जीतने – हारने से दूर तू ही तू रहेगा ।
ना ही दंगा होगा ना ही फसाद, मेरा धर्म तो तू ही होगा।
गाडा जाऊँ या जलाया जाऊँ, मैं तन तो कई बार मिटा, मिट के किसी का पेट भर जाऊँ कुत्ते खायें या कौऐ इसका अहसास ना होगा मुझे ।
मैं अपने पागलपन में पास तुझे समझता रहूँ तू है या नहीं इसका ना गम होगा मुझे ।
पागल होना दुःख है तो; सिर्फ तेरे रहने का अहसास रहे, बस मन में इससे बड़ा ना कोई सुख है।


- डॉ.संतोष सिंह