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Hymn No. 249 | Date: 01-Aug-1998
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मेरे प्रिय काका अभी कहाँ तूझे देखा, जिस दिन होगी तेरी कृपा देखेंगे हम तुझे अंतरमन में अपने।
मेरे प्रिय काका अभी कहाँ तूझे देखा, जिस दिन होगी तेरी कृपा देखेंगे हम तुझे अंतरमन में अपने।
अभी कहाँ कुछ भी जान है तेरे बारे में, जिस दिन हौले से दिल को थपथपायेंगा उस दिन जान जायेगे सब कुछ हम ।
प्यार क्या होता हैं मिलन – विरह कीसे कहते हैं, जब दिल पूर्णतः समा जायेगा तुझमें;
तब जानूँगा मैं।
सब कुछ है मिल जाता, क्यों नहीं मिलता सद्गुरू, जब तक संसार का मोह नष्ट ना होता है गुरू कृपा से गुरू कहाँ मिलता ।
गुरू की छत्र – छाया में कैसे रहना, सतत यत्न करना पड़ता है, मुख्य कर्म इसे बनाना पड़ता है, बाकी तो सब कुछ गौण है ।
गुरू को कैसे पूज सकते है, हर पल गुरू में खोये हुये, हर इशारा उसका समझते हुये, प्राणों की परवाह ना करते हुये तू उसके कार्य को निभाना सदा ।
गुरू को क्या अर्पण करना, सौंप देना खुदको गुरू के श्री चरणों में, तन की खाल की जूती बनाकें अर्पित करना, बिन उफ् कीये ।
सद्गुरू से बढ़के कोई नाता नहीं, नाही उसके अलावा कोई भाता, गुरू को पाते है और खोते है संसार का तो अस्तित्व ही नहीं।


- डॉ.संतोष सिंह