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Hymn No. 248 | Date: 31-Jul-1998
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मुस्कुराता है बहुत तू, देख देखके हमारी उलझनें;
मुस्कुराता है बहुत तू, देख देखके हमारी उलझनें;
पर तुझको ही सुलझानी होंगी एक – एक हमारी उलझनें ।
इसी बहाने तू करीब तो आयेगा, भले ही धोखा दे हमारी नजरें हमको ;
पर दिल तुझको जरूर पहचान जायेगा ।
तेरी ये अदा भी हमको भायेगी, मन को हमारे बहुत लुभायेगी;
तेरे आने के आनंद में हो साराबोर मैं नाचूँगा बनके बाँवरा ।
कौन क्या कहेगा मुझे भला क्या, मैं तो हो चुका हुंगा बहरा;
मुझे तो नाही सुननी है कीसकी बात, दिल ही दिल में तेरी बात सुनूँगा।
तब ना रहेगा मुझको कहना, कीसी से कुछ भी;
मैं तो हर बात दिल ही दिल में तुझसे कहूँगा ।
मिन्नत मेरी जारी रहेगी तुझसे हर पल तेरे लिये,
तेरा नाम गुनगुनाऊँगा हर पल खोया रहूँगा में तुझमें।
- डॉ.संतोष सिंह
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जंग मेरी जारी है अपने आप से, रंग में रंगने के लिये तेरे;
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मेरे प्रिय काका अभी कहाँ तूझे देखा, जिस दिन होगी तेरी कृपा देखेंगे हम तुझे अंतरमन में अपने।
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