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Hymn No. 247 | Date: 31-Jul-1998
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जंग मेरी जारी है अपने आप से, रंग में रंगने के लिये तेरे;
जंग मेरी जारी है अपने आप से, रंग में रंगने के लिये तेरे;
अभी भी अपनी इच्छाओं का गुलाम हूँ मैं, कहने में ना कोई संकोच है ।
जंग मेरी तब तक होती रहेगी खुदकी – खुदसे, जब तक खुदको जीत न जाऊँ;
आशीष होगा तेरा, यह हथियार है मेरा बडा धारदार उससे ना कोई बचा।
हारी हुई जंग हम जीत जायँगे, तेरे नाम का हुँकार भरके ;
माना की ये जंग चल रही है सदियों से, पर अंत उसका आ गया ।
विकट परिस्थिती थी हम हार रहे थे बार – बार,
वो तो तेरी कृपा थी, जो तू मेरी तरफ से आ गया ।
दम लेंगे तभी जब जीत जायेगे हम ये जंग खुदकी - खुदसे;
तब करीब आऊँगा मैं तेरे, हौले से सर को झुकाऊँगा।
दिल से कहता हूँ फिर ना कभी ये सर तेरे सामने उठाऊँगा ।


- डॉ.संतोष सिंह