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Hymn No. 246 | Date: 30-Jul-1998
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कैसी निराशा, कैसा चिठ़ तब हर कोई है भाता, जब सद्गुरू से हो नाता।
कैसी निराशा, कैसा चिठ़ तब हर कोई है भाता, जब सद्गुरू से हो नाता।
वही है माता वही पिता, सारे जग का जगन्माता, परम् पिता का साक्षात स्वरूप है वो।
दिल लगाते है जो उससे, उनको वो मिलता है सदा साथ – साथ वो रहता है ।
मन से डर निकल जाता है चाहे कुछ भी खो जाये, इसको पाके सबकुछ पा जाते है ।
खुशी और गम उसके लिये ही होती है, करीब आना उसकी खुशी है दूर जाना गमी है ।
तब उसके सिवाय् ना ही कुछ रूचता मन को, ना ही कूछ सुझता है ।
पल भर के लिये बिछुडना पतन लगता है अपना, मिल गया तो वो स्वर्ग भी कुछ नहीं ।
हर पल बिन चूके जतन करना है उसके नाम से, काम नहीं आना कुछ भी ।
राग – द्वेष छोडके बसता है वो हमारे दिलों में, फिर भी भूल जाते है हम उसको ।
पत्थर की मूरत के आगे सर झुकाते है, पर उसके अंदर की चेतना को समझ नहीं पाते ।
- डॉ.संतोष सिंह
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