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Hymn No. 2555 | Date: 29-Mar-2001
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म थ सा, नि ध प, म ग, म ग , म घ, रें सा।
म थ सा, नि ध प, म ग, म ग , म घ, रें सा।
आओं हम सब सुर से सुर मिलाये, प्रेम का कोई नया गीत गाये।
सृष्टि ने किया पुर श्रृंगार, ओढ़ लीन्ही प्रेम की मनभावन चदरिया।
झूम उठा हर तन मन, सुनके कुहूंके डाल डाल से कोयलीया की।
मुरझाये चेहरो पे मुस्कान खिली, क्यों जीव अजीव हर एकत्व को जीवनदान मिला।
अंतर मिट गया चेतन अचेतन का, जो बही बहार मनभावन की।
झर्र झर्र बहने लगी निझ्रर अंतर से प्रेम की धार, हुआ बेसुध जो मिलायी तान।
डूबा हर दिल प्रेम की बातों में, तोड़के दुनियावी रागों को।
म थ सा, नि ध प, म ग, म ग , म घ, रें सा।
पुकार उठा हर क्षुद्र मानव मन, प्रभु प्रेम को ऐसा न तरसा बुझा दे तू जनम जनम की प्यास को।


- डॉ.संतोष सिंह