Hymn No. 2557 | Date: 19-Apr-2002
सा, नि-प, म-प, ग-म, नि-घ, निं-सा।
सा, नि-प, म-प, ग-म, नि-घ, निं-सा। सांझ हो या सवेरा, याद आये प्रभु मोहे तोरा। बाट जोहत – जोहत ऊनींद सा हो जाऊँ, पर थाके नही मोरा दिल। मुरझांया हुआ मनवा खिल जाये, जो बही बहार बसंत की। न जाने किस ओर से आये.. न जाने किस ओर ये जाये..। छेड़ राग कोयलिया सुमधुर, चाहूं या ना चाहूं खिंचा चला जाये चित्त मोरा। सा, नि-प, म-प, ग-म, नि-घ, नि-सा। सांझ हो या सवेरा, याद आवे प्रभु मोहे तोरा। आकाश भी लागे खिला - खिला, जैसे हुआ सृजन अभी - अभी। कहे कोई भी कुछ, इक् मस्ती छाई रहती है हम सबके दिलों में। लोग बाग हो या फूलों के बगीचे, झूमें ऐसे जैसे किये हो पान सुधा का। दूरियाँ मिटाने को मजबूर होता है दिल, फिर भी तू क्यों न मिले कभी भी। साँझ हो या सवेरा, याद आवे प्रभु मोहे तोरा। सां, नि-प, म-प, ग-म, नि-घ, निं-सा।
- डॉ.संतोष सिंह
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