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Hymn No. 252 | Date: 02-Aug-1998
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अतिथि तो है देव के समान्, मगर वे गुरूभाई है तो साक्षात परमेश्वर है।
अतिथि तो है देव के समान्, मगर वे गुरूभाई है तो साक्षात परमेश्वर है।
धन्य हुआ मेरे घर का कोना – कोना, जिनको छूने को मिला चरण उनका।
परम् स्नेही साक्षात मां के अवतार है ममता की मूरत है वे ।
अधरों पे खेले मुस्कान उनकी चाहें कीतनी भी हो विषम परिस्थिती ।
आज के समय में वे गुरू कृपा से ब्रह्माण्ड के हर रहस्य को जानने में सक्षम् है, फिर भी सरलता पूर्वक रहते है ।
ज्ञान के साक्षात मूरत है वे जिनको दिया आशीर्वाद उन्होंने वो ब्रह्नज्ञानी हो गया।
घमंड और गर्व से दूर सदा वे गुरू के चरणों में निमग्न रहते है ।
माया के संसार में रहके, हर बंधन को सहजरा से निभाते हुये, निर्मल दिल से गुरू से जुड़े हुये है।
आँखो में उनके करूणा है, दिल में अपने – पराये का भेद नहीं, व्यवहार के लिये दिखावा करते है वे।
साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश पधारें मेरे दर पे आज, मैं मूरख कैसे स्वागत करूँ उनका।
ऐ मेरे परम् सद्गुरू सम्भाल ले तू मुझे, चला है दीया – सूरज को अपने घर बुलाने।
जो भी तू करवायेगा, वो करूँगा, नमन करके उनको रुखा – सूखा प्रेम से अर्पण करूँगा।
3 तारीख को अल्पा जी, प्रीती जी और हीरा जी आ रहे है उनके चरणों में अर्पित ।
- डॉ.संतोष सिंह
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