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Hymn No. 253 | Date: 03-Aug-1998
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सदियों से मेरा नाता है उसके संग, फिर भी न जान पाये उसे हम,
सदियों से मेरा नाता है उसके संग, फिर भी न जान पाये उसे हम,
ज्ञान का वो सागर, इस ब्रह्माण्ड का सबसे बडा अज्ञानी मैं ।
निर्मल प्रेम का दरिया है वो, कलुषित था जीवन हमारा ।
उसकी महानता है, लायक ना थे उसके फिर भी अपने करीब लाया ।
अपने प्रेम और ज्ञान से, हमारे मन के मैल को धो डाला उसने ।
कभी उसने कीसी से कुछ न माँगा, प्यार के बदले सब कुछ दे डाला ।
अपनी बेख्याली में भी, ध्यान रखा उसने हमारा ।
कोई दीवार ना खड़ी की, अपने और अपने भक्तो के बीच ।
किसी भी हथियार से कोई भी ना जीता उसे, प्यार के आगे हथियार डाला ।
मैं इतना काबिल नहीं लिख सकूँ उसके बारे में, जो भी लिखा उसने ही लिखाया ।


- डॉ.संतोष सिंह