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Hymn No. 254 | Date: 03-Aug-1998
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जीना सीखाता है वो, मरना भी सिखाता है ;
जीना सीखाता है वो, मरना भी सिखाता है ;
मर – मरके क्या मरना, इस बार मरना पड़ा तो ।
उसका होके मर जान, मौत तो तन की होये;
तन तू ना है, तन तो इक् सपना है ।
आज नहीं तो कल, उसका टूटना नियति है,
सीख ले तू मरना उससे, फिर ना मरना पड़ेगा कभी ।
सूरज चाँद बीते, तू ना बीतेगा कभी;
उसके सिवाय कोई ना तेरा, जो आज अपने है कल पराये होगे।
एक बार बन जा तू उसका, सब हो जायेगे तेरे;
पा लेगा सब कुछ तो भी, प ान सका गर तू उसको।
बंधा रहेगा पशुओं की तरह इस संसार में,
जीवन तो जीता है, हर प्राणी – पौधा इस जग में ।
कुछ सूक्ष्म तो कुछ महाविशाल, सुंदर से सुंदर है यहाँ;
एक से बढके एक जीवन जीके जीवन बदलते है ।
कही ना मिले ठिकाना उनको, यहाँ – वहाँ भटकतें सदा;
जिसने लिया शरण तेरे चरणो में, मौत के बाद मौत न आये उसकी।


- डॉ.संतोष सिंह