Hymn No. 255 | Date: 04-Aug-1998
बह जाऊँ तेरे प्रेम में इतना, तोड़ दूँ हर बंधन को,
बह जाऊँ तेरे प्रेम में इतना, तोड़ दूँ हर बंधन को, ना तोड़ने का अहसास हो, मैं तो बस बहता चला जाऊँ । कहाँ जान, कहाँ रुकना, मैं डूब रहा हूँ की तैर रहा हूँ; कुछ भी ना खबर है मुझको, मैं बेखबर रहूँ तुझमें । बहता ही चला जाऊँ तेरे सहारे, मैं तुझमें ही बहता रहूँ ; बहने के सिवाय कोई काम न हो, बस बहता ही रहूँ । ना ध्यान हो कीसी बात का, तुझसे अलग कोई ख्याल ना हो, एक तू रहे, तू ही तू रहे, बहता रहूँ निर्बांध गति से तुझमें । ना ही ठौर हो, ना ही ठिकाना, ना ही कोई मेरा मुकाम हो, होश ना है रखना मुझको अपना, बस बहता रहूँ तेरे प्रेम में । जल्दी क्या, देर क्या है, इन सबसे बेखबर हो बहता रहूँ; लुप्त हो चुका हूँ या अलग – थलग पड़ा है, बेखबर हो बहता रहूँ । बहते, बहते, बस बहता चला जाऊँ, बह रहा हूँ या रूक गया हूँ । क्या हुआ, क्या ना हुआ, ना पता हो मुझे अपना हो जाऊँ मैं।
- डॉ.संतोष सिंह
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