VIEW HYMN

Hymn No. 256 | Date: 04-Aug-1998
Text Size
तेरा प्रेम है कैसा मैंने अब तक नहीं जाना, पर आना जरूर है उसको,
तेरा प्रेम है कैसा मैंने अब तक नहीं जाना, पर आना जरूर है उसको,
तू मेरे पास नहीं है तो क्या, तू मुझसे दूर भी बहुत नहीं है ।
मैं सामर्थ्यहीन हूँ तो क्या तू तो सामर्थ्यवान है, मैं नहीं आ सका तो क्या?
मेरा मन पहुँच गया है तेरे पास, तेरे मन में आ गया तो तू जरूर पहुंच जायेगा मुख तक।
तेरी हर बात में रहता है कोई ना कोई राज, यूँ ही तू कहता है बहुत कुछ,
वो बहुत कुछ भी हम कुछ भी ना समझ पाते, फिर भी तू देता है समझा कीसी और तरीके से।
अज्ञानी मैं, तू तो साक्षात ज्ञानी, कितना बेमेल है ये मेल, हमारा फिर भी तेरे चेहरे पे कोई शिकन नहीं ।
करीब से करीब तू हमको करीब लाता है, अपनाता है, त्याग करना सिखाता हें सारे कर्मों का।
हमारे भूत को भूलके, लोगों के भूत को भूलाना फिर उनके संग वर्तमान में जीना सीखाता है तू हमें।
भविष्य की हर कल्पना से मुक्त, वर्तमान में रहके कुछ करना सीखाता है।
कल्पनाओं से परे है तू, सब कुछ पाके अधूरा है जीवन हमारा ।
तेरी कृपा थी जो संसार में रहके तूझकों पा गये हम, अब तो मर के भी तुझे पाना है तेरी कृपा से।


- डॉ.संतोष सिंह