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Hymn No. 2696 | Date: 17-Sep-2003
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सब कुछ मिटते हुये देखा, जिंदगी को हर पल बदलते देखा।
सब कुछ मिटते हुये देखा, जिंदगी को हर पल बदलते देखा।
सवाल के बाद सवाल, न जाने कितने ख्वाबों को तुझमें सिमटते देखा।
चाहे अ न चाहे, किसी धर्म को माने पर कर्मों को जिंदगी से खेलते देखा।
खुदको जिंदगी के हर पड़ाव से अविराम गति से गुजरते देखा।
अपने हो या पराये सब को अविराम गति से गुजरते देखा।
बिना भेद के प्रारब्ध के आगे सब को एक तराजू में तौलते देखा।
महान है तू जो दिया सानिध्य हमको, तुझको ही सब कुछ भुगतते देखा।
रोये रोना हम अपनी बेहाली का, हंसते हुये हमारे दर्द को तुझे पीते देखा।
बार बार राह पे तू लाये, तेरे आगे हम सब कुछ भूल जायें।


- डॉ.संतोष सिंह