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Hymn No. 2695 | Date: 17-Sep-2003
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कड़ी हैं हम कल की, जो जीते है जिंदगी को।
कड़ी हैं हम कल की, जो जीते है जिंदगी को।
पल पल बीती को बिसारके, दोहराते है जिंदगी को।
जानकार है उस बालक की तरह, जो खेले आग से।
जल जाने पे रोये, फिर भी खेले उस आग से।
एक के बाद दूजी धारणा टूटें, फिर भी मन न माने।
नश्वरता से भरी जिंदगी को, बस अपना सब कुछ जाने।
पड़ी है न जाने कैसी मोह की पट्टी, जो हटाये न हटती।
ध्यान बटाये मौत, पर कुछ दिन मैं जिंदगी भुलाये।
ईश्वर तेरी कृपा से बिना बदले बदलती नहीं जिंदगी।
बिन् तेरी बंदगी के, मिलता नही कुछ जिंदगी मैं।


- डॉ.संतोष सिंह