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Hymn No. 2694 | Date: 17-Sep-2003
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कब क्या हो जाये, किसी को न है खबर।
कब क्या हो जाये, किसी को न है खबर।
हंसती खेलती जिंदगी मैं, कब कौन सा पल आ जाये।
श्वास भर का फर्क है मौत ओर जिंदगी मैं।
जो न चाहे वही हो जाये, होनी पे बस नहीं किसीका।
कर्मों की खेती जन्म देती है किस्मत को।
कोई बिरला ही बनाये अपने अनुरूप जिंदगी को।
साक्षात जो है उसे भुलाके, नश्वरता का गीत गाते है।
रब जानते हुये सब, अनजान रहते है तुझसे।
संजोया हुआ खाक हो जाये, नये जीवन की शुरूआत हो जाये।
सपनों के बाद स्वप्न, कब शुरूआत होगी सत्य के दर्शन की।


- डॉ.संतोष सिंह