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Hymn No. 2728 | Date: 30-Oct-2003
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मेरे शब्द होंगे कमजोर, मेरे मन मैं होंगे कई भेद।
मेरे शब्द होंगे कमजोर, मेरे मन मैं होंगे कई भेद।
अंदाज नहीं होगा मेरे कुकर्मो का, पर सानी रखता हैँ प्यार मेरा।
कहा हुआ कभी किया नहीं तेरा, न ही चाहतों को तेरी अपनाया।
वख्त पड़ने पे ना ना की रट् लगायी, पर यादों ने सुँकूँ लेने न दिया।
अपने ही जाल मैं फंसता गया, दूजों पे हर पल हंसता रहा।
मौका एक बार नहीं कई बार गंवाया, पर तेरे नाम को न कभी बुलाया।
कर्मों को देख हंसती रही दुनिया, अपने ही पैर पे कुल्हाड़ी मार ले रहा।
चेताया न जाने तू कितनी बार, हर बार देर से भाग के पास तेरे हो आया।
गर्त मैं धंस चुका हूँ, आस कि सारी किरणे बुझती जा रही हैं।
तेरी एक बात बार याद आये, जब होगा सब खत्म तब होगी नई शुरूआत।


- डॉ.संतोष सिंह