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Hymn No. 2730 | Date: 31-Oct-2003
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जन्मना उत्सव है तो, मौत भी किसी उत्सव से कम नहीं।
जन्मना उत्सव है तो, मौत भी किसी उत्सव से कम नहीं।
जिसका मनाया जाता है, उसकी मौजूदगी कमी होके होती नही।
जिदंगी मौजूदगी को बयाँ करती है तो मौत ना मौजूदगी का नाम नहीं।
अस्तित्व दोनों मैं एक सा कायम है, फर्क देखने वाले के दिल मैं है।
कहने को तो ख्वाब है दुनिया, और सच से रूबरू कराती है मौत।
कितने माने, इसे जानने को तो जाने सब, रब के सिवाय सच कुछ नही।
पहलू बदलता है समय के साँचे मैं ढलके, जो आज अपनाया वों कल पाया है।
देश और जाति मैं बंधे हम सब का हाल एकसा होता है।
तोड़ पाये इस इंद्रजाल को कोई बिरला, जो हर काल मैं अकाल हो जाता है।
दाल भले न गले इस जन्म मैं, शुरूआत तो प्रेम मैं पगला के की जा सकती है।


- डॉ.संतोष सिंह