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Hymn No. 2767 | Date: 16-Mar-2004
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है... रह रहके कहा फंस जाता हूँ तेरी करने से पहले क्यों फिसल जाता हूँ।
है... रह रहके कहा फंस जाता हूँ तेरी करने से पहले क्यों फिसल जाता हूँ।
सम्भलके अब तक चलना न आया, जो चला कुछ कदम न जाने कब गिरा।
क्यों का अहसास है दिल को, फिर भी भ्रम में रखा अपने मन को।
देर अब तेरी और से न है, देर तो जानबूझ के में क्यों कर रहा हूँ।
मालिक ये मन का कैंसा जाल है, जो टूटने पे ओर भी गहरा जकड़े जाये।
कभी लगता था तू दूर है हमसे, पर आज वो न बात है।
तुझसे ज्यादा कोई करीब नहीं, फिर भी मन क्यों इतना बदमाश है।
खेल रहा हूँ दुनिया से, पर सच पूछों तो खेलूँ मैं अपने आप से।
मौसम की बात छोड़ो बेमौसम मैं भी निभा रहा हूँ माया को।
पता नहीं कब ये छोड़ेगा मुझे, पर छोड़ने से पहले जो होऊँ तैयार मैं।
- डॉ.संतोष सिंह
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