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Hymn No. 2779 | Date: 16-Apr-2004
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मैं एक गरीब गुंरबा हूँ, जिसका कोई नही अपना।
मैं एक गरीब गुंरबा हूँ, जिसका कोई नही अपना।
एक तेरे सिवाय, एक तेरे सिवाय नहीं कोई सपना, नहीं कोई अपना।
विश्वास की बात है, उसके सिवाय नही है कुछ मेरे पास।
बस एक तू है चाहे छोड़ दे या अनंत जिंदगी भर साथ दे दे।
एक से बढ़के एक तेरी दुनिया में, उनके आगे न है मेरी कोई बिसात।
परवाने भी हैं, दीवानें भी है, मस्तानों के आगे कहाँ ये खाकसार।
सहम जाता हूँ सोंचके, डर जाता हूँ अपनी औकात को जानके।
उसी पल चूर हो जाता हूँ तेरे प्यार मैं, दूर हो जाता हूँ दुनिया से दुनिया में रहके।
मिटा देना चाहता हूँ हर फासला, मिल मिलके बिछुड़ना नही चाहता अब।
सबक सीखना चाहता हूँ प्यार का, पल पल बिताना चाहता हूँ प्यार में।


- डॉ.संतोष सिंह