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Hymn No. 2790 | Date: 19-May-2004
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छोड़ के न जाओ तुम अभी, इतनी क्या जल्दी है।
छोड़ के न जाओ तुम अभी, इतनी क्या जल्दी है।
खता जो भी हुई हमसे, सजा देने की क्यो तुमको जल्दी है।
उम्र के उस दौर मैं मिला, जहां दुनिया से हमने कुछ न सिखा था।
सीधे सीधे न कहके कुछ हमसे, इशारों में क्यों तूने समझाया।
पूरा स्वीकार करके, क्यों आधा अधूरा स्वीकारने का खेल रचाया।
संग संग रखके, क्यों रखा दूर हमको सदा जमात से अपनी।
इतने ही गये गुजरे थे तो क्यों पास आपके बुलाके महफूज रखा।
मुख मोड़ ले अब तू कितना भी, मुख मोड़ न सकेंगे हम।
जो तू ने न अब स्वीकारा, जी जीके तेरे यादों मैं मर मरके जियेंगे।
भोगूंगा जीवन के हर हिस्सें को, थरथराये कितना भी तुझसे कहने न आऊंगा।


- डॉ.संतोष सिंह