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Hymn No. 2789 | Date: 19-Apr-2004
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हैं असंख्य कमियाँ हममें, एक को पार करने चलते हैं घेर लेती है लाखो।
हैं असंख्य कमियाँ हममें, एक को पार करने चलते हैं घेर लेती है लाखो।
न जाने कब क्या कर जाये, वश मैं आके किसके, हम ही नहीं खुद जानते।
लाख चाहा निकल जाने को, चाहने से क्या होये, फितरत जो न बदली जिंदगी की।
शर्म का परदा तार तार हो जाये, दुहाई दे चाहे कितनी, मौका मिलते दोहराते वही है।
फर्क यही है दुनिया से, तेरे करीब रहते बदलने की गुहार करते है हम तुझसे।
निराश न किया तूने किसीको, मेरी क्या बिसात, होगी कब पूरी मेरे दिल की बात।
सांचे मैं ढल गया हूँ, पकना बाकी है तेरे प्रेम अगन मैं, चाहे होवे कुछ भी।
दोष ना देता हूँ, न ही प्रयासों से मुंह मोड़ है, झूठा हूँ या सच्चा पूरा करुँगा।
आज बदनुमा दाग जरूर हूं, समय रहते तेरे रूप मैं चारचांद जरूर हूँ।
लगाऊँगा काला तिल बनके।


- डॉ.संतोष सिंह