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Hymn No. 2788 | Date: 18-May-2004
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दीवानगी के जोश में था अकेला, फिर भी जमाने से कम न था।
दीवानगी के जोश में था अकेला, फिर भी जमाने से कम न था।

न सोच थी, न कोई ओर तरंग, उमगो के सिवाय् दिल मैं कोई जोम न था।

रहते थे मस्त हवाओ के मानिंद, जब मौज हुयी बह गये बिना किसी कारण।

हालात ये थे इतराते फिरते थे अपने मैं, न किसी ओर के रंग मैं।

मौजों की सवारी करते करते टकराया दुनिया के सबसे बड़े खेवैये से।

तो लगा वाह री किस्मत जिसको लोग ढूंढ़ते, वो आ गया हमको ढूंढ़ते।

बिन कुछ किये मिल गया, हमको दुनिया का सबसे बड़ा सहारा।

मुस्कराके तब उसने कहा करना होगा खुद पे भरोसा, तभी मिलेगा आसरा।

फासला बढ़ता जायेगा तेरें मेरे बीच का, जो तू हाथ न हिलायेगा।


- डॉ.संतोष सिंह