VIEW HYMN

Hymn No. 2878 | Date: 04-Nov-2004
Text Size
अंतर में कुछ उमड़ घुमड़ रहा है, जिसे ढंग से मैं नहीं कह पा रहा हूँ।
अंतर में कुछ उमड़ घुमड़ रहा है, जिसे ढंग से मैं नहीं कह पा रहा हूँ।
ज्यों ज्यों ढूंढ़ता हूँ निशब्दता का अहसास होता है मेरे रोम रोम को।
मन के किसी कोने मैं कोई आवाज नहीं होती, फिर भी अहसास कुछ होता है।
शब्दों से परे कुछ झनझना जाये मेरे अंतर को, जो उठे दिल प्रेम तरंग बनके।
बड़ी विचित्र सी हालात होती है, मैं खुद को पाके भी नहीं पाता हूँ बस होने का अहसास रहता है।
कुछ यो जैसे जिंदा लाश के साथ रहता हूँ दिन रात, चीख के तब तेरे पास दौड़ता हूँ।
डर के मारे लेता हूँ तेरा नाम जोर जोर से, करता हूँ खुद से सवाल क्या ये मैं खुद हूँ।
हर श्वासों मैं होता है दिल के धड़कने का अहसास, प्रभु तेरा प्रेम और डर से लेने का।
कितना क्षुद्र वजूद है, आज है तो कल नहीं, फिर भी अपने होने का गरूर सदा से है।
कैसे कहूँ क्या मैं हूँ चाहता, पर इन सबके बीच सदा से मैं तुझको हूँ ढूंढ़ता।


- डॉ.संतोष सिंह