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Hymn No. 2899 | Date: 24-Nov-2004
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दिल मैं जलती रहे तेरी प्रेम ज्योति सतत, डूब रहा हूँ प्रेम तरंगो में।
दिल मैं जलती रहे तेरी प्रेम ज्योति सतत, डूब रहा हूँ प्रेम तरंगो में।
मन नाचे बनके मोर आगे तेरे, कामनाओं के सर्प का मर्दन करुँ ताल देते।
उडूं बनके, विहंग अनंत की ओर, चले ना अब किसी का कोई मुझपे जोर।
उठे ना अंतर में अब कोई शोर, हो मेरे भीतर सिर्फ तेरे प्रेम की गूंज।
मजबूर रहा दिल के हाथों पल पल, जो कहे दिल वही करने मैं बीते जिंदगी।
चुरा लें जाऊँ तुझे ख्वाबों की दुनिया से, हकीकत के संसार में अपना बनाके।
बांध सके ना अब कोई, जो बिखर जाउँ तेरे अनंत साम्राज्य में तेरा बनके।
टूट जाये तन मन की हर जंजीर, बह जाऊँ जो अब प्रेम की अविरल धारा बनके।


- डॉ.संतोष सिंह