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Hymn No. 2898 | Date: 23-Nov-2004
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धंसता कैसी है जिंदगी को, जानके अनजान हूँ सब कुछ जिंदगी से।
धंसता कैसी है जिंदगी को, जानके अनजान हूँ सब कुछ जिंदगी से।
रहबर ने नवाजा न जाने कितने अनमोल प्यार से, फिर भी अनजान हूँ अपने आप से।
सताये मुझको पल पल आवारा ये मन, निकलने की राह जानके चल ना सके हम।
- डॉ.संतोष सिंह
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रह नहीं पाता हूँ जब जब याद तेरी आती है,
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दिल मैं जलती रहे तेरी प्रेम ज्योति सतत, डूब रहा हूँ प्रेम तरंगो में।
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