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Hymn No. 2897 | Date: 23-Nov-2004
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रह नहीं पाता हूँ जब जब याद तेरी आती है,
रह नहीं पाता हूँ जब जब याद तेरी आती है,
भुली बिसरी यादों से तिर उठता हूँ, खुदको भुल जाता हूँ।
क्या कहूं अपने आपको, जो हल देखूं ख्वाब सुनहरे,
हकीकतो के धरातल पे रहते, जो सीखना न चाहूं जिंदगी से।
मायूसी से भरे दौर में, जहमत न उठाऊँ कुछ करने की,
अहमक हूँ ऐसा नाउम्मीद होके भी उम्मीद का साया नहीं छोड़ता।
यह कैसी फितरत पायी है, न जाने किन वजहों से,
सब कुछ लुटते हुये देखके, शर्म नहीं आती अपनेआप पे।
ख्वाबों ख्यालों से छुड़ाये ना छूटे पीछा, जिंदगी जो बन गयी है ख्वाब।
तरसता हूँ अपने प्यार को, जिसे दे न सका अब तक अंजाम।


- डॉ.संतोष सिंह