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Hymn No. 2896 | Date: 20-Nov-2004
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कुछ ना है मेरे पास, जो दे सकूं मैं तुझे आज,
कुछ ना है मेरे पास, जो दे सकूं मैं तुझे आज,
झुठे शब्द हैं, झुठी बातें हजार, मनमाने कर्मों का सैलाब।
व्हबर तेरे नाम को जपता हूँ, पर कुछ नहीं करता हूँ,
वादा किया अनेकोनेक तुझसे, पर हर बार तुझे उससे तोड़ता हूँ।
बहुत चाहा खुद को बदलना, प्रेम के सिवाय कुछ ना नवाजा।
हर बार हारा, खुद के मनचाहे कर्मों से तुझे मारा।
ना रंग भर सका ख्वाबों में, ना जी सका जिंदगी को,
बड़ा विचित्र हूँ उससे भी ज्यादा विचित्रताओं से भरी जिंदगी मेरी।
कोरे कागज़ को काले काले करके तेरे नाम को रोता हूँ,
सच पुछो तो बिखरी हुयी जिंदगी को संजोता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह