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Hymn No. 2901 | Date: 04-Dec-2004
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रत हुये बिना विरक्ति की बात करते हो,
रत हुये बिना विरक्ति की बात करते हो,
संसार को जाने बिना सन्यास की बात करते हो।
असत्य का आलाप करते हुये सत्य का प्रलाप करते हो,
विचित्र विरोधाभासों मैं खुद को जकड़के सरलता बंयान करते हो।
आलस्य के बीच रहके पुरूषार्थ का बखान करते हो,
भगोड़ो का जीवन जीते परम् वीरता की दास्ताँ कहते हो।
मोह की पट्टी ओढ़े हुये, खुद को खुदा कहते हो,
जो खुद ने न जाना, वो संसार मैं बयान करते हो।
दिलों को जीत न सका तो किताबों की क्या बात करते हो,
मनमाने कर्मों को कर करके तुम संयम का पाठ पढ़ाते हो।
सारी आस्थाओं का उपहास उड़ा करके विश्वास करते हो,
दोहरे जीवन को जीते हुये तुम मुक्ति का ख्वाब देखते हो।


- डॉ.संतोष सिंह