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Hymn No. 2912 | Date: 28-Dec-2004
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जो भी हो तुम तुम्हारे सिवाय कोई न है मेरा,
जो भी हो तुम तुम्हारे सिवाय कोई न है मेरा,
कहे चाहे कोई भी कुछ, तुम्हारे बिना मैं हूँ अकेला।
तड़पे अंतर्मन पल पल, गुहार लगाऊँ तुझसे हर पल,
नींद का हो बिछौना या दुनियाका मेला, तुमको ही खोजूं।
कहने को तो हूँ दुनिया में, करता हूँ हर कर्म दुनिया का,
चैन नही अंतर के किसी कोने में, लगे हर पल है कुछ अधूरा।
बहुत चाहा क्यों जाऊँ भुलाके सब कुछ दुनिया के किसी कोने में,
पल भर को भुला न पाया, सतत् खुदको तेरा नाम लेते पाया।
ये कैसा प्यार है, जो तड़पे तड़प को पूरी न होने दे,
सतत बहती है तेरी कृपा की धार, फिर भी तरस रहे तेरे दीदार को।
आग लगी है दिल मैं, जो बुझाये न बुझें बढ़ती ही जाये,
आहत मन राहत पाये तेरे पास पहुँचके वो भी कुछ पल के वास्ते।
इसे गीत न समझो ये हाल है मेरी जिंदगी का,
जो हालात मैं करता है तुझे याद, बिना किसी वजह के।


- डॉ.संतोष सिंह