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Hymn No. 2995 | Date: 07-Aug-2005
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कैसे कहूँ जो न प्यार है तुझसे, जहाँ भी जाऊँ याद आये तेरी।
कैसे कहूँ जो न प्यार है तुझसे, जहाँ भी जाऊँ याद आये तेरी।
भुला बहुत बार हर बार याद आयी तेरी, दिल लगाना चाहा लगा न मन।
तन में रहके तन का होना न आया, खुद को तेरे पीछे पीछे दौड़ता पाऊँ।
सीखने मैं कुछ कमी न थी दुनिया की, करने मैं ही कमी रह गयी थी।
हर बार मन को ऊबते पाया, दिल को तेरे ख्यालों में डूबते पाया।
सवाल कैसे करुँ तुझसे, जो सवालों का जवाब दिल में पहले से पाया।
नजर नजर का फेर है, जब जब दूर तुझसे समझा, उतना ही करीब तेरे आया।
मुकद्दर का खेल है या मेरे कर्मा का फेर, पर पल पल तुझे पास पाया।
जब जब लगा न दिया कुछ तूने मुझे, ऐसा कुछ न पाया जो दिया हुआ हो तेरा।
तेरे रहते मैं अलग हूँ तुझसे बहुत चाहा, पर एक बार भी ना ऐसा कह पाया।


- डॉ.संतोष सिंह