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Hymn No. 3010 | Date: 15-Dec-2005
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अभी तो बहुत कुछ चाहूँ तुझसे, तुझसे दूर रहके तुझको ही पास पाऊँ।
अभी तो बहुत कुछ चाहूँ तुझसे, तुझसे दूर रहके तुझको ही पास पाऊँ।
लाख समझाया समझ न आया दिल को, मन के फरेब मैं फंसके जो तेरे पास आया।
मस्त हूँ फिर भी मस्ती का जो आलम है, श्वास दर श्वास जो चूर है प्यार मैं तेरे।
होता है न होते हुये चाहें हुये मेरे, बदलके भी जो न बदले फितरत मेरी।
रह न गया हूँ अब मैं अपने आपका, जो पल पल खो जाना चाहूँ तुझमें।
रह रहके नाचे मन मयूर जैसा, धड़कता है दिल जो तेरे प्यार की थाप पे।
न जाने ये कैसी मस्ती है, क्या इसी को कहते है दीवानगी का आलम।
फनाह हो जाना चाहूँ, जो मेरी तकदीर तदबीर का मालिक बन गया है तू।
तेरी मुस्कान भी करे घायल, अब किसे है जीने की चाहत जो फिदा हूँ तूझपे।
मेरी न सूनी कभी तूने, न ही सुनना आगे कभी, मौत से परे जो तेरा साथ मिला मुझे।


- डॉ.संतोष सिंह