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Hymn No. 3009 | Date: 18-Nov-2005
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शब्द दर शब्दों को तरसूं जो तेरे पास रहते।
शब्द दर शब्दों को तरसूं जो तेरे पास रहते।
तब दूर ही सही था, जो खत्म न होती थी गीतों की लड़ी।
ऐसी झड़ी लगी रहती थी, होश न होता था होने का।
दम भरने को जो मिले फुरसत, तो तेरी यादों से घायल होते थे।
तब अनवरत् प्रेम का सिलसिला चलाये रखे हो तेरे पास या दूर हम।
खोये खोये तेरे पास पहुँचे, ओर तू भी आये जल्दी जल्दी।
बात तब की अब क्यों नही, पास रहके तू साथ क्यों नही है।
उन बातों का क्या जो तूने थी कही, या हमने यों ही थी सुनी
रोता हूँ अकेले में, फिर भी न चाहूँ अहसास हो तुझको।
इसमें भी है मजा जो मजबूर करे कि तू पास है मेरे।
18th November 2005
चाहत मरती नहीं कभी बदले रूप, बदले चाहे जमाना।
अंजाम से डरती नही वो कभी, चाहे हो कोई पैमाना।
रोके रोक सकता नहीं, चाहे गलत हो या सही,
किस्मत जो घटने पे तुल गई, तो किसीके वश में नहीं।
- डॉ.संतोष सिंह
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