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Hymn No. 3012 | Date: 28-Dec-2005
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चारों ओर, चारों ओर नजर जहां तक उठे, छायी है तेरी रहनुमाई
चारों ओर, चारों ओर नजर जहां तक उठे, छायी है तेरी रहनुमाई
हर कोई झूमे तुझमे एक मानव को छोड़ कर जो समझे वो है समझें सब।
बहार बहे प्रेम की, छोड़े मस्ती की फुहार हर जिंदादिल में।
चाहतों का ही अंजाम है, जो तेरे पास रहके तुझसे दूर हैं हम।
इच्छाओं का जाम मिलता है सबको, कोई बिरला ही बच पाये इससे।
दरियादिली है तेरी जो देता है हर तकलीफों पे विराम, नहीं तो दम निकल जाये हमारा।
पाने के लिये करनी पड़ती है मेहनत, तब बरसे परम् कृपा तेरी।
आंखो में लिये श्रध्दा की बूंद, दिल में जलाये विश्वास की बाती करते हैं गुहार तुझसे।
आज तक रहा अनजान रहते अपनों के बीच, जो है बस सपनों के जैसे।
आस तो बस एक तुझसे है जो बुलाया है पास, तो रखेगा सदा साथ अपने।
- डॉ.संतोष सिंह
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मेरे गिरधर मेरे गोपाल, दे दे तू मुझे आज वरदान।
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