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Hymn No. 3020 | Date: 09-Dec-2005
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आलम है ये कैसा, आलम है ये कैसा,
आलम है ये कैसा, आलम है ये कैसा,
जालिम जमाने में आलम है ये कैसा।

सर चढ़के है बोलता, आलम है कैसा,

काटो तो खून नहीं, जो मसरूफ दिल रहता है आ...
चैन इसके, बिना नहीं आता, चैन इसमें ही है पाता,
आलम है...

भरमाने को भरमाता, पनाह जो इसमें ही है पाता,

आलम है...
सुनें हुये किस्सों को हकीकत मैं है लाता
आलम है...

यार से दूर हो या यार के पास, बस मदहोश है रहता

आलम है...
बंद हो या खुली आंखे, विचरता है ख्वाबो में
आलम है...

सुध रहती नहीं अपने की, सुध कैसे ले किसीकी

आलम है ये...
दुनिया में रहके दुनिया का दस्तूर निभाता,
न जाने कब कैसे प्यार वो कर जाता बेआलम...

मौज ही मौज होती, जो उसके पास पहुँच जाता,

आलम है ये...
मस्ती की मौजों पे हो सवार, दरिया को आंख दिखाता,

आलम है ये...

न जाने कब किस ओर बढ़ जाता, जहाँ अच्छो के कदम

ठिठक जाते है ये आलम है ये...
कोई उसका कुछ कर न पाये, चाहे लाख रोड़े अटकाये,
आलम है ये कैसा...

लाख भटके हुये जो शरण मैं आये उनपे कृपा बरसाता

चुपके से प्यार की मौजों मैं बदलके अपने संग

ले जाता आलम है ये....... कैसा


- डॉ.संतोष सिंह