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Hymn No. 3022 | Date: 24-Jan-2006
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क्यों नही ढलते है शब्द गीतो में,
क्यों नही ढलते है शब्द गीतो में,


क्यों नही जीता हूँ हर श्वास को प्रेम से।
क्यों पाता हूँ अब तक खुद को दूर तुझसे,


सच देखा जाये तो कितना करीब हूँ तेरे।
जल रहा हूँ किस्मत की आग मैं कब से,


खाक हो जाने से पहले हो जाना चाहूँ तेरा।
तड़पते मन की तपन को कम कर नहीं पाऊँ,


मिलने के बाद भी मिलने के वास्ते जो तरसूं।
दे रहा है तू आज नही न जाने कब से,


जतन करना न आया, गंवाया कई बार तेरे रहते।
क्यों नही है हममें वो बात, तेरा करने का वो अंदाज,


जहां तेरे सिवाय हो न कुछ, चाहे हो जाये कुछ।
घड़ी भरके जीवन में कसम साता हूँ तेरे वास्ते,


क्यों न ललक पैदा हो जाये जो दे जाये सौगात तेरी।


- डॉ.संतोष सिंह